મા પર કવિની મશહૂર પંક્તિઓ
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई
यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया
मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ
आई मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी
माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी
गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं
अभी मस्ज़िद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
मुनव्वर माँ के सामने कभी खुलकर नहीं रोना,
जहाँ बुनियाद हो, इतनी नमी अच्छी नहीं होती ।
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है ।
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ
~ मुनव्वर राणा
26.11.1952 – 14.1.2024
મુનવ્વર રાણા ઉર્દૂ અદબમાં પોતાના અલગ અંદાજમાં શાયરી કરનારા કવિ હતા. સાહિત્ય જગતમાં એમનું સ્થાન વિશિષ્ટ રહ્યું. સાહિત્ય અકાદમી પુરસ્કારથી સમ્માનિત આ શાયરની મા પર લખેલી શાયરી ખૂબ પ્રસિદ્ધિ પામી છે. માતા પર એમણે જે લખ્યું એ અનોખું છે.
શાયરના આત્માને સલામ
કવિના કેટલાક ખૂબ જાણીતા શેર
आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया
हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं
नये कमरों में अब चीजें पुरानी कौन रखता है
परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है
मोहाजिरो यही तारीख है मकानों की
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा
तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गयी बे-तरतीबी
इससे पहले मेरा कमरा भी ग़ज़ल जैसा था
किसी भी मोड़ पर तुमसे वफ़ादारी नहीं होगी
हमें मालूम है तुमको यह बीमारी नहीं होगी
तुझे अकेले पढूँ कोई हम-सबक न रहे
मैं चाहता हूँ कि तुझ पर किसी का हक न रहे
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ देख लिया था
फ़रिश्ते आके उनके जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाडू लगाते हैं
सिरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
~ मुनव्वर राणा

સ્મૃતિ વંદન.
કવિ શ્રી ની ચેતના ને પ્રણામ
સ્મરણ વંદના.
ખૂબ સરસ અને ઉત્તમ શેરોની પસંદગી.